मंदिरा बेदी की क्रांतिकारी लड़ाई जो महिला क्रिकेट को विश्व विजेता बना गई!

मंदिरा बेदी
मंदिरा बेदी

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ऐतिहासिक रात: 2025 वर्ल्ड कप की जीत और एक अनदेखी ट्वीट की ताकत

2 नवंबर 2025 की रात ऐतिहासिक थी। डीवाई पाटिल स्टेडियम में शोर था। भारत की बेटियों ने कमाल कर दिया। इतिहास रच दिया। सोशल मीडिया नीले रंग से पट गया। वाकई वो रात अद्भुत थी। प्रधानमंत्री मोदी ट्वीट कर रहे थे। दिग्गजों के बधाई संदेश आ रहे थे। हर कोई हमारे खिलाड़ियों के कसीदे पढ़ रहा था। इसी जश्न के शोर में एक संदेश और था, जिसमें लिखा था: “What a journey, what a fight, sweet victory. So well deserved. Big congratulations to Team India. Women’s cricket has come such a long way.” आप सोच रहे होंगे कि इसमें क्या खास है? इससे बेहतर-बेहतर तरीके से लोगों ने शुभकामनाएं दी। मगर जनाब, यह किसी खास शख्स का था। किसका? मंदिरा बेदी का।

रहस्यमयी हीरोइन: रील की एक्ट्रेस, रियल लाइफ की क्रिकेट क्रांति

कौन मंदिरा बेदी? अरे वही डीडीएलजे वाली या फिर किसी पुराने सीरियल में देखा होगा आपने। मगर यहां तो वो सिर्फ एक कलाकार थी। माने रील की। रियल जिंदगी में वो हीरो हैं। वो हीरो जिन्होंने महिला क्रिकेट की जड़ में उम्मीदों का पानी डाला। उसे इस लायक बनाया कि जब विदेशी दौरे हो तो वह किसी अच्छे होटल में रुक सके। इस काबिल बनाया कि वो देश के अंदर ही ट्रेन के जनरल कोच में नहीं बल्कि प्लेन से जा सकें। जी हां, हम बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। मंदिरा बेदी महिला क्रिकेट की वो अनसंग हीरो हैं जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता। मगर यह सब इतना आसान नहीं था।

इसके लिए मंदिरा ने ताने सुने, कपड़ों पर कमेंट सुने और जिल्लत झेली मगर हार नहीं मानी और क्रिकेट को बदल दिया। कैसे बदला? क्या हुआ था मंदिरा के साथ?

अंधेरे का दौर: 2000s में महिला क्रिकेट की दर्दनाक हकीकत

बात है 2000 के दशक की शुरुआत की। जब सौरव गांगुली की कप्तानी में भारतीय पुरुष टीम ने ऑस्ट्रेलिया को टेस्ट सीरीज में हराया था। विश्व कप में शानदार प्रदर्शन किया था। माने हर गली मोहल्ले में सचिन और सौरभ के चर्चे थे। दूसरी ओर महिला क्रिकेट टीम भी थी जिसमें ममता माबीन, मिताली राज और झूलन गोस्वामी जैसे खिलाड़ी थे। जिनका वर्तमान और भविष्य दोनों अंधेरे में थे। खेल अच्छा चल रहा था। न्यूजीलैंड के खिलाफ सीरीज भी जीती थी।

मगर कैसे? सिर्फ जुनून से। क्योंकि उनके पास ना पैसा था, ना एक्सपोज़र, और स्पॉन्सर तो जैसे कोई दूर का सपना था। आखिरी बार 1997 के वर्ल्ड कप में उन्हें Hero Honda ने स्पॉन्सर किया था। उसके बाद 2004 तक कोई बड़ा नाम उनके साथ नहीं जुड़ा। पूर्व क्रिकेटर और डब्ल्यूसीएआई की सेक्रेटरी शुभांगी कुलकर्णी याद करती हैं कि टीम को चलाने के लिए फंड जुटाना एक बहुत बड़ी चुनौती थी। इंटरनेशनल इवेंट्स के लिए तो उन्हें कई रातों तक नींद नहीं आती थी कि पैसा कहां से आएगा? घरेलू क्रिकेट में ट्रेनों की सेकंड क्लास में सफर करना पड़ता था।

इकोनमी होटलों में या कभी-कभी तो विदेश दौरे पर एनआरआई परिवारों के घर में रुकना पड़ता था। क्योंकि होटल के लिए पैसे नहीं थे। 2003-4 में वुमेन इंडिया टीम ने न्यूजीलैंड के खिलाफ चार एक से जीत हासिल की थी। जिसके बाद हर खिलाड़ी को सिर्फ ₹7500 मिले थे। माने उस वक्त कोई खिलाड़ी क्रिकेट को फुल टाइम करियर नहीं बना सकता था। ये सब एक ऐसा बुरा फंक्शन था कि स्पॉनसरशिप नहीं थी तो पब्लिसिटी नहीं मिलती थी। पब्लिसिटी नहीं मिलती थी तो स्पॉनसरशिप नहीं मिलती थी। यह एक करियर का संघर्ष था। दूसरा, महिलाओं के घर में भी संघर्ष था।

माने कई लड़कियों के माता-पिता क्रिकेट खेलने की इजाजत नहीं देते थे। यह कहकर कि क्रिकेट पुरुषों का खेल है। कहा जाता था धूप में रंग काला हो जाएगा। टैन हो जाएगा और फिर शादी नहीं होगी। पूर्व कप्तान सुधा शाह बताती हैं जब लड़कियां सफेद ड्रेस में ग्राउंड पर जाती थीं तो लोग उन्हें घूरते थे। यहां तक कि कुछ लड़के छेड़ते भी थे। हॉकी और बैडमिंटन खेलना ठीक था, पर क्रिकेट नहीं।

क्रिकेट स्टूडियो में तूफान: मंदिरा का बहादुराना प्रवेश

महिला क्रिकेट के लिए पहले इस अंधेरे में एक रोशनी की किरण आई मंदिरा बेदी। साल था 2003 माने पुरुष वर्ल्ड कप का मौका जो Sony मैक्स पर भी स्ट्रीम किया जाना था। इस चैनल पर आने वाले एक शो एक्स्ट्रा इनिंग के लिए एक ऐसा फैसला लिया गया जिसने भारतीय क्रिकेट टेलीकास्ट का इतिहास बदल दिया। उन्होंने मंदिरा बेदी को होस्ट के रूप में चुना। मंदिरा बेदी इससे पहले लोग इन्हें सिर्फ दूरदर्शन के शो, शांति की मजबूत महिला और दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगी कि प्रीति के रूप में जानते थे। मगर अब वो क्रिकेट स्टूडियो के पुरुषों के क्लब में कदम रख रही थी। मंदिरा के लिए यह सफर बिल्कुल आसान नहीं था।

वो जानती थी कि वो एक ऐसे क्षेत्र में जा रही हैं जहां पुरुषों का दबदबा है। मंदिरा बताती है उन्हें हजारों महिलाओं के ऑडिशन के बाद चुना गया था। उन्हें चैनल ने साफ कहा था कि उन्हें क्रिकेट के एक्सपर्ट के तौर पर नहीं बल्कि आम आदमी के सवालों को पूछने के लिए पैनल में बिठाया गया है। लेकिन पैनल में बैठे पूर्व दिग्गज क्रिकेटर उन्हें देखकर खुश नहीं होते थे। मंदिरा बताती हैं पैनल के अंदर जब वो कोई सवाल पूछती तो जवाब में उन्हें घूर कर देखा जाता था। दिग्गज उनकी तरफ देखते फिर कैमरे की तरफ मुड़ते और जो बात उन्हें करनी होती थी वही करते थे। माने मंदिरा के सवाल का कोई जवाब नहीं।

इस शो में पहले हफ्ते तो मंदिरा बहुत रोई थी क्योंकि उन्हें शो में बहुत अपमानित होना पड़ता था। यह सब होता देख चैनल ने इंटरफेयर किया और मंदिरा से कहा हमने तुम्हें 1000 महिलाओं में से चुना है। हमें पता है कि तुम में यह बात है। तुम एक्सपर्ट नहीं हो लेकिन तुम्हारे मन में जो सवाल आता है वो वैलिड है। हमें उस बोरिंग पैनल में मस्ती चाहिए और हां कुछ भी ऑफ द टेबल नहीं है। इस बातचीत ने मंदिरा के दिमाग में स्विच ऑन कर दिया। और फिर मंदिरा ने पूरे पैनल के हावभाव बदल दिए। पूरा पैनल जो पहले सीरियस बैठकर डिस्कस करता था अब हंसी-मजाक भी करता था।

साहसी विद्रोह: साड़ी और स्टाइल से तोड़ दीं पुरानी जंजीरें

हालांकि मंदिरा का अचीवमेंट सिर्फ पैनल को बदलने तक सीमित नहीं है। उन्होंने उनके पहनावे पर हो रहे हंगामे से भी लड़ा। मंदिरा साड़ी और नूडल स्ट्रैप ब्लाउज पहनकर क्रिकेट पर बात करने वाली पहली महिला बनी। यह उनके अपने ब्लाउज थे। वह खुद बताती हैं ऐसे ब्लाउज उन्होंने इसलिए चुने ताकि वह भारतीय मैचों के दौरान साड़ी पहनकर भारत को अपना समर्थन दे सकें। लेकिन इस पर इतना बवाल हुआ कि अखबारों ने हेडलाइन छाप दी।

उन्हें डम्मी, बिबो या एयर हेड कहा गया। इन कमेंट्स पर हमेशा मंदिरा का यह कहना होता था जब पैनल में बैठे छह पुरुष एक तरह के कपड़े पहन सकते हैं तो वह अच्छे और रंगीन कपड़े क्यों नहीं पहन सकती? अपनी शर्तों पर काम करना, पैनल में बदलाव लाना और कपड़ों में फर्क खत्म करना यह मंदिरा की खुद के लिए लड़ाई थी। मगर इसका असर महिला क्रिकेट पर भी खूब पड़ा। क्योंकि मंदिरा अब वुमेन क्रिकेट के हक की लड़ाई शुरू करने वाली थी।

मिशन इंपॉसिबल: स्पॉन्सरशिप की जंग और निजी कमाई का बलिदान

जैसा कि हमने आपको शुरुआत में ही बताया था। वक्त होगा साल 2004-5 का। मंदिरा ने डब्ल्यूसीएआई यानी वुमेन क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ इंडिया के कुछ सदस्यों से मुलाकात की। यह संस्था उस वक्त भारतीय महिला क्रिकेट को कंट्रोल करती थी। डब्ल्यूसीएआई के सदस्यों से बात करने के बाद मंदिरा ने कहा, हमारी महिला क्रिकेट टीम बहुत अच्छा खेल रही है। अभी-अभी न्यूजीलैंड सीरीज 4-0 से जीती है। लेकिन बहुत कम लोगों को इसके बारे में पता है। मैं इसे एक मिशन के तौर पर लेना चाहूंगी। सुनील गावस्कर की छोटी बहन पूर्व डब्ल्यूसीएआई सेक्रेटरी नूतन गावस्कर याद करती हैं। महिला क्रिकेट उस समय पेशेवर खेल नहीं था।

इसलिए कोई फाइनेंसियल हेल्प नहीं मिलती थी। मंदिरा का रोल यहीं शुरू हुआ। उस वक्त अस्मी ज्वेलरी हीरो का एक मशहूर ब्रांड था जिसकी ब्रांड एंबेसडर थी मंदिरा बेदी। उन्होंने इस ब्रांड के लिए कमर्शियल शूट किए थे। इसी दौरान उन्होंने एक ऐसा डिसीजन लिया जिसने डब्ल्यूसीएआई के सदस्यों को हैरान कर दिया। मंदिरा ने अपनी पूरी एंडोर्समेंट फीस डब्ल्यूसीएआई को दान दे दी। हालांकि मंदिरा के हिसाब से यह कोई डोनेशन नहीं था। यह एक समझौता था। मंदिरा ने यह डील इस तरह की कि जो पैसा उन्हें एंडोर्समेंट के लिए मिलना था वो सीधे क्रिकेट स्पॉनसरशिप में चला गया। यह पैसा मंदिरा की अपनी जेब से आया था।

ब्रांड के अतिरिक्त खर्चे से नहीं। अब सवाल यह कि इस पैसे का इस्तेमाल कहां हुआ? इंग्लैंड के दौरे के लिए हवाई टिकट खरीदने में। सोचने वाली बात है कि जो टीम देश को रिप्रेजेंट कर रही है, उसे हवाई टिकट खरीदने के लिए एक्ट्रेस के निजी कमाई का इस्तेमाल करना पड़ा। इतना ही नहीं मंदिरा ने अस्मी को भारतीय महिला टीम के लिए टाइटल और टीम स्पॉन्सर बनने के लिए भी तैयार किया। वेस्ट इंडीज के खिलाफ होने वाली वनडे सीरीज में भारतीय महिला खिलाड़ियों की जर्सी पर पहली बार अस्मी का नाम था। इस सीरीज के लिए ट्रॉफी का नाम भी स्पॉन्सर के नाम पर रखा गया था।

पूर्व डब्ल्यूसीएआई सेक्रेटरी नूतन गावस्कर ने इस मुश्किल दौर को याद करते हुए कहा मंदिरा बेदी ने अपनी पूरी एंडोर्समेंट फीस डब्ल्यूसीएआई को दान कर दी। उस पैसे से हमें भारत के इंग्लैंड दौरे के लिए हवाई टिकट की व्यवस्था करने में मदद मिली। इस बारे में पूर्व भारतीय खिलाड़ी और डब्ल्यूसीएआई की सेक्रेटरी शुभांगी कुलकर्णी कहती हैं, स्पॉन्सर मिलना बहुत मुश्किल था लेकिन जब मंदिरा ने जिम्मेदारी ली तो अन्य कॉर्पोरेट ने भी दिलचस्पी दिखाई। जल्द ही सहारा जैसे बड़े कॉर्पोरेट ने भी महिला क्रिकेट में कदम रखा। मंदिरा बेदी ने सिर्फ एक सीरीज के लिए ही नहीं बल्कि आगे आने वाली सीरीज के लिए भी स्पॉन्सर ढूंढ लिए थे।

यकीन मानिए मंदिरा के इस कदम से चीजें बदलने लगी। मैच टेलीविजन पर दिखाए जाने लगे और लोग महिला क्रिकेट में इंटरेस्ट लेने लगे। यह तो बस शुरुआत थी। अभी तो बहुत कुछ होना बाकी था।

ट्रांसफॉर्मेशन का जादू: BCCI का अधिग्रहण और सुनहरी सुविधाएं

साल 2006 में BCCI ने WCAI को अपने अधीन ले लिया। यानी अब सुविधाएं बेहतर होने लगी। माने अब उन्हें बेहतर ग्राउंड मिलने लगे थे। अच्छे होटलों की सुविधा मिलने लगी थी। सफर के लिए फ्लाइट्स के टिकट मिलने लगे थे। सबसे बड़ी बात स्पॉन्सर्स मिलने लगे थे। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि अगर साल 2004-5 में मंदिरा ने टीम इंडिया की फाइनेंसियल हेल्प नहीं की होती तो शायद उन्हें बाकी सुविधाएं मिलने में बहुत वक्त लग जाता।

ग्लोरियस लिगेसी: WPL से विश्व कप तक – मंदिरा की अमिट छाप

यह पहले की कहानी थी, और आज भारतीय टीम कहां है? किसी से छुपा नहीं है। खिलाड़ियों को IPL के तर्ज पर WPL मिला है, जो उनके एक्सपोज़र को नेक्स्ट लेवल पर ले गया। हरमनप्रीत कौर, स्मृति मंधाना, शेफाली वर्मा और जेमिमा रोड्रिग्स जैसे खिलाड़ी जबरदस्त क्रिकेट खेलते हैं। इसमें भी स्मृति मंधाना ने तो विराट कोहली का रिकॉर्ड तक तोड़ दिया। उन्होंने साल 2025 में वनडे में सिर्फ 50 गेंद में शतक मार दिया। जबकि विराट कोहली ने साल 2013 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 52 गेंद में शतक मारा था।

अब लड़कियों को बेहतर कोच, फिजियो, ट्रेनर और वीडियो एनालिस्ट मिलते हैं जो पहले सिर्फ मैनेजर के भरोसे रहती थीं। यह सब बदलाव उस नींव पर खड़े हैं जिसकी एक ईंट मंदिरा बेदी ने चुपके से रखी थी। और फिर आता है वह ऐतिहासिक लम्हा, 2025 का वर्ल्ड कप फाइनल। मुंबई के डीवाई पाटिल स्टेडियम में दर्शकों के शोर के बीच भारतीय महिला टीम ने साउथ अफ्रीका को हराकर वो ट्रॉफी उठाई जिसका सपना सालों से देखा जा रहा था। यह जीत सिर्फ क्रिकेट की नहीं थी।

यह उन तमाम लड़कियों की जीत थी जो कभी धूप में खेलने या शादी ना होने के डर से खेल छोड़ देती थीं। यह उन लड़कियों की जीत थी जिन्हें उनके माता-पिता ने खेलने की इजाजत नहीं दी। और इन सारी अचीवमेंट्स के हिस्से का सबसे बड़ा नाम है मंदिरा बेदी। जिन्हें हम द अनसंग वॉरियर कहें तो गलत नहीं होगा।

अंतिम विचार: आपकी राय क्या है, योद्धा?

इस कहानी के बाद आप मंदिरा बेदी के बारे में क्या सोचते हैं? कमेंट करके जरूर बताएं। बहुत शुक्रिया।

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