गुरमीत राम रहीम सिंह: भगवान बनने की चाहत और अपराध की सच्चाई AK-47 से धमकी

गुरमीत राम रहीम सिंह
गुरमीत राम रहीम सिंह

नमस्कार दोस्तों,
आज की इस ब्लॉग पोस्ट में हम एक ऐसी कहानी पर बात करेंगे जो भारतीय समाज के एक काले अध्याय को उजागर करती है। यह कहानी एक फोन कॉल से शुरू होती है, जो एक धार्मिक नेता की दुनिया को हिला देती है। गुरमीत राम रहीम सिंह – कुछ के लिए भगवान, कुछ के लिए अपराधी। आइए, इसकी पूरी सच्चाई को जानें, जो तहलका मैगज़ीन की रिपोर्टिंग, कोर्ट केस और कई किताबों पर आधारित है।

एक रहस्यमयी फोन कॉल और एक खतरे की सूचना
अप्रैल 2007 में तहलका के पत्रकार अनुराग त्रिपाठी को एक फोन कॉल आता है। दूसरी तरफ से आवाज़ आती है – “मेरी जान खतरे में है।” कॉलर अपना नाम नहीं बताता, लेकिन वह हरियाणा के सिरसा में डेरा सच्चा सौदा चलाने वाले एक धार्मिक नेता के बारे में बताता है। यह नेता संत गुरमीत राम रहीम सिंह है – कोई उन्हें गुरु कहता है, तो कोई भगवान।

दिल्ली के तहलका ऑफिस के पास, जीके-2 में एक मीटिंग होती है। वह व्यक्ति अनुराग को एक लिफाफा थमा देता है। अंदर एक पत्र है, जो 2002 में एक साध्वी ने लिखा था। यह पत्र प्राइम मिनिस्टर अटल बिहारी वाजपेयी को संबोधित था। पत्र में लिखा था:
“मैं पंजाब की रहने वाली एक लड़की हूं और 5 साल से डेरा सच्चा सौदा, सिरसा, हरियाणा में साध्वी के तौर पर काम कर रही हूं। यहां हम जैसे सैकड़ों लड़कियां हैं, जो दिन के 16-17 घंटे काम करती हैं, बिना किसी आराम के। यहां बहुत गलत हो रहा है। हमें यहां शारीरिक रूप से शोषित किया जा रहा है। डेरा के महाराज गुरमीत सिंह ही इस शोषण के लिए जिम्मेदार हैं।”

साध्वी अपनी पहली घटना बयान करती है:
एक शाम एक महिला प्रचारिका ने कहा कि गुरमीत राम रहीम सिंह महाराज खुद मुझसे मिलना चाहते हैं। वह मुझे नीचे एक तहखाने में ले गई। वहां चारों ओर सिक्योरिटी गार्ड तैनात थे। यह उनकी निजी गुफा थी। अंदर जाकर मैंने देखा कि वह वहां बैठे थे। उन्होंने कहा, “तू याद कर जब तू मेरी शिष्या बनी थी। तूने अपना तन-मन सब कुछ मुझे अर्पित किया था और मैंने तेरी भेंट स्वीकार की थी। तो अब तेरे तन और मन मेरे हैं।”

उस वक्त मैं पत्थर की तरह जम गई। मुझे समझ नहीं आया क्या करना है। बस इतना पता था कि उस रात के बाद सब कुछ बदल गया। जब उन्होंने रोकने की कोशिश की, तो गुरमीत राम रहीम सिंह ने कहा, “मैं भगवान हूं।” और फिर उन्होंने उनका शोषण किया।

पत्र के अनुसार, गुरमीत युवा महिलाओं का नियमित रूप से शोषण करता था डेरा के अंडरग्राउंड चैंबर में। तीन महीनों के दौरान उस साध्वी की बारी लगातार 20-30 दिन बाद आती। डेरे की ऊंची दीवारों के बीच 35-40 महिलाएं कैद थीं। न वे कहीं जा सकतीं, न किसी को बता सकतीं। उनके परिवार वाले भी उनकी बात नहीं मानते। अगर कोई आवाज उठाती, तो उसे चुप करा दिया जाता और धमकी दी जाती।

डेरे के गार्ड परिवारों को धमकाते कि गुरमीत इतना ताकतवर है कि उसे कोई छू भी नहीं सकता। पत्र में यह भी लिखा गया कि बड़े-बड़े पॉलिटिशियन गुरमीत राम रहीम सिंह के जेब में हैं। यह आदमी इतना पॉपुलर है पंजाब और हरियाणा में कि सजा मिलने के बावजूद वो ज्यादातर समय जेल के बाहर ही बिताता है। गुरमीत राम रहीम सिंह कई बार पैरोल या फरलो पर जेल से रिहा हो चुका है। सुनारिया जेल से एक बार फिर राम रहीम बाहर आ गए हैं – 40 दिन की पैरोल पर।

यह एक ऐसा आदमी है जिसने अपना धर्म बनाया और ऐसी फैन फॉलोइंग बनाई जिससे लोग उसके अनुयायी बन गए। यही नहीं, उसने अपनी मूवी भी रिलीज की। हमने दो किताबें पढ़ीं और कई न्यूज़ रिपोर्ट्स देखीं आपको गुरमीत राम रहीम की अनबिलीवेबल स्टोरी बताने के लिए।

डेरा सच्चा सौदा का उदय: आजादी के बाद का नया आध्यात्मिक आंदोलन
1947 में देश को आजादी मिलती है। पंजाब और हरियाणा में डेरों का प्रभाव बढ़ रहा है। यह कोई ट्रेडिशनल मंदिर या गुरुद्वारा नहीं है। इन डेरों के लीडर मेनस्ट्रीम से हटके हैं। ये लोग स्पिरिचुअल गाइडेंस और सोशल रिफॉर्म प्रॉमिस करते हैं – वो भी उन लोगों के लिए जिन्हें समाज ने इग्नोर कर रखा है। सदियों से अपर कास्ट सिख्स और हिंदुओं ने अपना कंट्रोल रखा रिलीजियस इंस्टीट्यूशंस पर। पिछड़ी जातियों जैसे दलितों और गरीबों को यहां एक्सेप्टेंस नहीं मिली।

लेकिन आजादी के बाद उभरे नए डेरों ने इन्हीं लोगों को हेल्प करने की कोशिश की। इन्होंने उन्हें डिग्निटी और आइडेंटिटी दी, जो मेनस्ट्रीम सिखिज्म और हिंदूइज्म से नहीं मिल रही थी। इन्होंने सिखिज्म, हिंदूइज्म और सूफी इन्फ्लुएंस को अपनाया, जिससे एक नया धर्म बना। इनमें सबसे पॉपुलर हुआ डेरा सच्चा सौदा।

शाह मस्ताना बलोचिस्तानी, जो बलोचिस्तान से एक स्पिरिचुअल लीडर थे, ने इसे 1948 में हरियाणा के सिरसा में बनाया। डेरा सच्चा सौदा ने कहा कि हमारी फिलॉसफी यह है कि हम कास्टिज्म के बिल्कुल खिलाफ हैं। हमें फर्क नहीं पड़ता कि आपकी जाति कौन सी है – बस यह कि आप इंसान हैं। बलोचिस्तानी को सुनने हजारों लोग पहुंचते – दलित और गरीब किसान शामिल।

अगले कुछ सालों में डेरा पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में पॉपुलर हो गया। शाह मस्ताना की उम्र बढ़ने पर उन्होंने शाह सतनाम सिंह को अपना सक्सेसर अपॉइंट किया। इन तीन स्टेट्स में अस्पताल, स्कूल्स और चर्चा घर खोले गए। 1970 तक डेरा सच्चा सौदा बस एक छोटा डेरा नहीं रहा, बल्कि एक पावरफुल इंस्टीट्यूशन बन गया – जमीन, पैसा और पॉलिटिकल इन्फ्लुएंस के साथ।

गुरमीत राम रहीम का जन्म और उदय
यही दुनिया है जिसमें गुरमीत राम रहीम सिंह का जन्म होता है। गुरमीत राजस्थान के श्री गंगानगर डिस्ट्रिक्ट के एक छोटे गांव में पैदा होते हैं। वो मगर सिंह के अकेले बेटे हैं – एक अमीर जाट सिख परिवार से, जहां अच्छी खासी जमीन है। कई बाबा गरीबी में पैदा होते हैं, लेकिन गुरमीत की हालत ऐसी नहीं। उनके पिताजी डेरा सच्चा सौदा में इनवॉल्व्ड थे – डोनेशन देते और समय बिताते। इसी वजह से 7 साल की उम्र में गुरमीत डेरा से जुड़ जाते हैं। वो वहां फिलॉसफी पढ़ते, गैदरिंग्स अटेंड करते और भक्ति समझते।

उनके बचपन के बारे में क्लैरिटी कम है – एक किताब में लिखा है कि उन्हें नौवीं क्लास में स्कूल से निकाल दिया गया, लेकिन फॉलोअर्स इसे फॉल्स प्रोपगैंडा कहते हैं। क्लियर है कि गुरमीत राम रहीम सिंह की दुनिया डेरे में बस गई।

बड़े होने पर उनकी दोस्ती गुर्जर सिंह राजस्थानी से हो जाती, जो चाइल्डहुड फ्रेंड था और बाद में खालिस्तान कमांडो फोर्स का मिलिटेंट लीडर बना। 1980 में शाह सतनाम सिंह की उम्र बढ़ रही है और सक्सेसर का सवाल उठता है। कई सीनियर लीडर्स हैं, लेकिन सितंबर 1990 में शाह सतनाम गुरमीत राम रहीम सिंह को अपना सक्सेसर बनाते हैं। कई लोग दंग रह जाते हैं। अफवाहें फैलती हैं – कुछ कहते हैं गुरमीत राम रहीम सिंह ने मिलिटेंट्स के साथ दबाव डाला, यहां तक कि AK-47 से धमकी दी। ऑफिशियल वर्जन है कि भगवान ने गुरमीत को चुना। सच क्या है, पता नहीं, लेकिन 23 सितंबर 1990 को गुरमीत डेरा सच्चा सौदा के ऑफिशियल लीडर बन जाते हैं।

डेरा में बदलाव और अंधेरा पक्ष
जैसे ही वो चीफ बनते हैं, डेरा में अजीब चीजें होने लगती हैं। पहला इंसिडेंट – सीनियर ऑफिशियल फकीर चंद का गायब होना। फकीर चंद सालों से सेवा कर रहे थे और गुरमीत राम रहीम सिंह के चीफ बनने पर सवाल उठाते। फिर वो गायब हो जाते – कोई एक्सप्लेनेशन नहीं। कई साल बाद साध्वी का लेटर आने पर उनका नाम फिर सुर्खियों में आया। लेकिन गुरमीत को टेंशन नहीं।

1990 में वो स्पिरिचुअल लीडर नहीं, बल्कि कल्ट फिगर बन जाते। पहले चीफ सिंपल रहते थे, लेकिन गुरमीत गॉडमैन हैं। “हम ऐसे बाप हैं जो दुश्मनों के लिए अकेले ही काफी हैं।” वो फॉलोअर्स से पूजा मांगते, अपनी प्राइवेट आर्मी रखते और क्लेम करते कि गरीबी-परेशानियां सुलझा सकते हैं।वो फॉलोअर्स की जिंदगी कंट्रोल करते – शादी, खर्च सब। डेरा अब स्पिरिचुअल इंस्टीट्यूशन नहीं, फाइनेंशियल एम्पायर है – फैक्ट्रीज (फूड, हर्बल, टेक्सटाइल, कॉस्मेटिक्स), हॉस्पिटल, स्कूल, कॉलेज। सिरसा में 700 एकड़ जमीन, रियल एस्टेट, पेट्रोल पंप, सुपरमार्केट, लग्जरी रेस्टोरेंट्स। डोनेशन की जरूरत नहीं – डेरा कॉर्पोरेट एम्पायर है।

21वीं सदी में पॉलिटिशियन गुरमीत राम रहीम सिंह के सामने मत्था टेकते। कारण? वोट्स। लाखों फॉलोअर्स, खासकर दलित और पिछड़े – पंजाब, हरियाणा, राजस्थान का मेजर वोट बैंक। गुरमीत किसी पार्टी को सपोर्ट करें, तो उसके फॉलोअर्स वोट देंगे। इसी पावर से डार्क चैप्टर शुरू होता है।

2002 का पत्र और बदला
2002 में पीएम वाजपेयी के ऑफिस में एक एक्सप्लोसिव लेटर आता – डेरा में महिलाओं का शोषण। गुरमीत राम रहीम सिंह को खबर लगती है – उनके लिए वॉर डिक्लेरेशन। सस्पिशन रंजीत सिंह पर, जो एक्स-साध्वी का भाई था। रंजीत डेरा सेवादार था। 10 जुलाई 2002 को कुरुक्षेत्र में रंजीत की हत्या हो जाती – फायरिंग से। डेरा में साइलेंस। लेकिन रंजीत अकेला दुश्मन नहीं।

रामचंद्र छत्रपति – एक छोटे न्यूज़पेपर “पूरी सच” के एडिटर। साध्वी का लेटर पब्लिक होने पर रामचंद्र इसे छापते। धमकियां मिलतीं, लेकिन वो रुकते नहीं। 24 अक्टूबर 2002 को शाम को रामचंद्र की हत्या – मोटरसाइकिल से फायरिंग। 28 दिन बाद 21 नवंबर को मौत। मौत के बाद हरियाणा में कोई जर्नलिस्ट गुरमीत राम रहीम सिंह के खिलाफ नहीं लिखता।

रामचंद्र
रामचंद्र

गुरमीत राम रहीम सिंह को लगा अब कोई रोक नहीं सकता, लेकिन वाजपेयी ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में बेंच सेटअप की – जस्टिस ए.के. गोयल के नेतृत्व में। सीबीआई इन्वेस्टिगेशन लॉन्च – शोषण, रंजीत और रामचंद्र मर्डर पर। सीबीआई टीम नर्वस थी – डेरा ऑफिशियल्स जवाब नहीं देते। महिलाओं की लिस्ट मांगने पर मना। इन्वेस्टिगेटर्स खुद विक्टिम्स ढूंढते। कई शादीशुदा, परिवार बात नहीं करने देते। बुजुर्ग डेरा चीफ के खिलाफ शब्द नहीं सुनना चाहते। लेकिन 5 साल बाद ब्रेकथ्रू – साध्वी मिली। वो कोड वर्ड, गुफा, गार्ड्स बतातीं। एविडेंस मिला। साध्वी ने कहा, “अगर परिवार को पता चला तो जिंदगी तबाह, लेकिन बाबा को सजा मिलनी चाहिए।”

सिरसा में अफवाहें, प्राइवेट मिलिट्री सड़कों पर। तहलका टीम को हर दुकान पर डेरा पोस्टर। चायवाला कहता, “तुम चले जाओगे, हमें इधर रहना है।” बलवंत सिंह लेटर डिस्ट्रीब्यूट करता – पीटा जाता, दुकान तोड़ी जाती। सीबीआई को पता चला डेरा की पकड़ – पुलिस को घूस की लिस्ट, फॉलोअर्स की डिटेल्स। इनर सर्कल मरने-मारने को तैयार। भागने वालों को धमकी – “तुम्हारी मां-बहन इधर हैं।” जुलाई 2007 में चार्जशीट – 1999-2001 में दो फॉलोअर्स का शोषण।

ट्रायल का लंबा सफर और पॉलिटिकल दबाव
ट्रायल सितंबर 2008 में शुरू। 2009-10 में महिलाएं टेस्टिमनी देतीं – लेकिन आरोपी को कोर्ट में देखना पड़ता। फॉलोअर्स मारने को तैयार। 2011 में ट्रायल पंचकूला शिफ्ट। तारीखें आतीं – डिले टैक्टिक्स। 10 साल बीत जाते। सीबीआई जॉइंट डायरेक्टर एम. नारायण लीड करते। गुरमीत का पब्लिक परसोना बढ़ता – सोशल रिफॉर्मर, ब्लड डोनेशन, डिजास्टर रिलीफ। पॉलिटिकल विंग हर पार्टी से सपोर्ट। कोई पार्टी नहीं सुनती। बड़े नेता कॉल करते – इन्वेस्टिगेशन धीरे करो।

2012 में शॉकिंग केस – हंसराज चौहान की पिटीशन। डेरा में जबरन कास्ट्रेशन – 100-200 के साथ। कोर्ट मेडिकल एग्जाम। हंसराज 2000 में जॉइन – स्पिरिचुअल गोल के नाम पर सर्जरी। ड्रग्स देकर कास्ट्रेट। धमकी। लिस्ट में 400 नाम। रीजन्स: लॉयल्टी, मैनिपुलेशन, पावर। 2014 में केस सीबीआई को। मेडिकल से साबित। लेकिन गुरमीत पर असर कम।

बॉलीवुड स्टार और अंतिम फैसला
2015 में फिल्म “MSG: द मैसेंजर ऑफ गॉड” रिलीज – कंट्रोवर्सी, लेकिन अपील से पास। लीला सैमसन रेजाइन। गुरमीत राम रहीम सिंह एक्टर, डायरेक्टर, सिंगर। MSG 2, जॉली LLB जैसी फिल्में। 2017 तक सेलिब्रिटी। लेकिन ट्रायल में खट्टा सिंह (ड्राइवर) टेस्टिमनी विड्रॉ, लेकिन अंशुल छत्रपति (रामचंद्र के बेटे) और साध्वियां नहीं रुकतीं। एम. नारायण टीम दबाव में नहीं।

25 अगस्त 2017 – जज जगदीप सिंह का फैसला: गिल्टी। कोर्टरूम शॉक। गुरमीत गिरते हैं, रोते हैं। कस्टडी। बाहर दंगे – 40 मौतें, दिल्ली तक। हेलीकॉप्टर से रोहतक जेल। 3 दिन बाद सेंटेंस – 20 साल। जज: “गॉडमैन बनकर पावर का फायदा उठाया।”

जेल के बाहर की जिंदगी: पैरोल का खेल
लेकिन भारत में बाबा को जेल पूरी नहीं करनी पड़ती। कई पैरोल – 2020 में 1 दिन, 2021 में 12 घंटे। फरवरी 2022 में पंजाब इलेक्शन से पहले 21 दिन। पैटर्न: इलेक्शन से पहले छूट, डेरा जाकर फॉलोअर्स से मिलना। जेड सिक्योरिटी, क्राउड एड्रेस। पंजाब मंत्री, अकाली लीडर हाजिरी। अगस्त 2025 में 40 दिन – कुल 300 दिन बाहर। रिकॉर्ड।

अंतिम विचार: एक सबक
कई ईमानदार सीबीआई ऑफिसर्स, जजेस और जर्नलिस्ट की वजह से कन्विक्शन मिला। लेकिन पॉलिटिक्स ने कीचड़ फैलाया। अगर फॉलोअर्स रैशनल होते, तो वोट बैंक का दबाव न होता। समस्या: फॉलोअर्स एक्सेप्ट नहीं करते कि पिताजी गलत कर सकते हैं। इससे सीख – हमारे देश में रैशनलिटी की कमी है।

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– आपका ब्लॉगर

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